दग़ाबाज़ी करने का अमेरिका-इज़रायल का पुराना रिकॉर्ड रहा...

आगे क्या होगा? बहुत से लोग यह आशंका जता रहे हैं कि यह युद्धविराम नहीं टिकेगा. उनकी आशंका वाज़िब भी है, क्योंकि दग़ाबाज़ी करने का अमेरिका-इज़रायल का पुराना रिकॉर्ड रहा है. लेकिन, इस बार मामला थोड़ा अलग है. आइए, कुछ तथ्यों की रोशनी में हालात को समझने की कोशिश करते हैं.

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1. युद्धविराम तोड़ने की सबसे ज़्यादा छटपटाहट इज़रायल (दरअसल नेतन्याहू) दिखाएगा. वह अब अपने देश में बुरी तरह घिर गया है. जनता के साथ-साथ विरोधी राजनेता उससे सवाल पूछने लगे हैं कि जब युद्धविराम की घोषणा हो रही थी, तो तुम्हें किसी ने पूछा तक नहीं. ट्रंप ने तुम्हारी तरफ़ से भी एलान कर दिया. तुम्हारी क्या औकात रह गई है? 

न तुम ईरान को झुका सके, न तुम ईरान में सत्ता बदला सके, न तुम अरब देशों को भड़का सके, न तुम ईरान की सैन्य क्षमता कमज़ोर कर सके. तुम किए क्या हो? सैनिकों ने जानें गंवाईं, इन्फ़्रास्ट्रक्चर बर्बाद हुए, लोग डर के मारे महीने भर बंकर में छिपे रहे. हासिल क्या हुआ?

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2. अमेरिका आगे बढ़कर युद्धविराम नहीं तोड़ेगा. ऐसा कहने की दो वजहें हैं. पहली, वह शिद्दत से कोई off-ramp ढूंढ रहा था, जहां से वह भाग सके. कल उसे वह मिल गया है. उसे पता है कि अगर वह दोबारा उलझा, तो इससे भी बुरा अंजाम होने वाला है. 

दूसरा, अगर युद्धविराम टूटा, तो अमेरिका को लड़ना पड़ेगा. इसके लिए अमेरिका की तैयारी नहीं है. उसके पास 800 किलोमीटर से ज़्यादा लंबी दूरी वाली जिन 2400 JASSM-ER मिसाइलों का भंडार था, उनमें अब बमुश्किल 300-400 बची हैं. उसने बाक़ी सब खपा लिए. वह ईरानी एयरस्पेस में घुसकर हमला करेगा, तो जहाज़ ध्वस्त होने का ख़तरा बना रहेगा. ज़मीनी हमले के लिए रसद का इंतज़ाम नहीं है. हैं तो और भी समस्याएं, लेकिन संक्षेप में यही समझिए कि अमेरिका लंबे युद्ध के लिए तैयार नहीं है. 

तो जो आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका इस समय का इस्तेमाल तैयारी के लिए कर रहा है, उसमें कोई दम नहीं है. अमेरिका दो हफ़्तों में ऐसी कोई तैयारी नहीं कर पाएगा, जो उसे आज की स्थिति से बेहतर बना दे. उसकी पूरी अर्थव्यवस्था डूब जाएगी. ट्रंप का चुनाव हारना तय हो जाएगा. तो कोई भी सनकी नेता अपनी हार की क़ीमत पर युद्ध नहीं चाहेगा. 

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दूसरी वजह है ट्रंप की शैली. ट्रंप एक मुद्दे से निकलता है, तो निकल ही जाता है. वह उसे भूलने के लिए कोई नया सुर्रा पकड़ता है. हां. इस बार ट्रंप के ऊपर दबाव ज़रूर रहेगा, क्योंकि दुनिया उसे हारे हुए नेता की तरह पेश कर रही है. अमेरिकी मीडिया भी उससे तमाम सवाल पूछ रहा है, लेकिन फ़ॉक्स न्यूज़ जैसे राइट-विंग चैनलों के ज़रिए ट्रंप अपना नैरेटिव चलाएगा कि वह जीत गया है. तो बैलेंस बना लेगा. 

यह युद्ध अमेरिका से ज़्यादा यहूदी लॉबी से घिरे ट्रंप का था. अमेरिकी सेना और ऐजेंसियों ने पहले-दूसरे हफ़्ते में ही हाथ खड़े कर लिए थे. अगर युद्ध अमेरिका का होता, तो ट्रंप इसे खींचता, लेकिन यह अमेरिकी इतिहास का सबसे अलोकप्रिय युद्ध था, जहां जनता इसके ख़िलाफ़ थी.

इसलिए, अमेरिका युद्धविराम तोड़ने की स्थिति में नहीं है. अगर उसकी स्थिति ठीक होती, तो वह युद्धविराम करता ही नहीं.  

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3. ईरान की तरफ़ से तो युद्धविराम टूटने का कोई सवाल ही नहीं है. उसने न पहले तोड़ा, न इस बार तोड़ेगा. उसने यह युद्ध जिस नैतिकता के साथ लड़ा है, वह बेमिसाल है. 

तो ले-देकर बात आ जाती है, इज़रायल के ऊपर. क्या वह युद्धविराम तोड़ेगा? यह थोड़ा जटिल है. जटिल क्यों है? क्योंकि वह कोशिश पूरी करेगा, लेकिन इस बार अगर उसने तोड़ा, तो अमेरिका खुलकर उसके साथ नहीं आने वाला. इन दो हफ़्तों में अगर वह तोड़ता है, तो ईरान-इज़रायल की सीधी टक्कर होगी और ईरान उसे बुरी तरह रगड़ देगा. 

इज़रायल, लेबनान मोर्चे पर आज सुबह से ही हलचल कर रहा है. ऐसे में लगता यही है कि नेतन्याहू को अमेरिका ने फ़ेस सेविंग के लिए लेबनान वाले मोर्चे पर तात्कालिक ढील दी है. 

हो सकता है कि इज़रायल फ़ॉल्स फ़्लैग करे, लेकिन अब खाड़ी देशों को भी समझ में आ गया है कि ईरान अगर हमले करता है, तो स्वीकार करता है. अगर इज़रायल फ़ॉल्स फ़्लैग करेगा, तो वह इलाक़े में और अलग-थलग पड़ेगा. 

बाक़ी, अगर हमें-आपको लग रहा है कि अमेरिका-इज़रायल करार तोड़ सकता है, तो यह बात हमसे-आपसे बेहतर ईरान को पता है. हमारे-आपके कहने से ईरान थोड़ी तैयारी करेगा, वह तैयार होकर बैठा हुआ है.
सोर्स: FB 
Dilip khan 

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