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हमें मौत से उतना ही इश्क़ है, जितना तुम्हें अपनी ज़िंदगी से

मैंने लड़ाई के नाम पर, पुलिस के खौफ़ से, भीड़ के शोर से अच्छे अच्छों के चेहरे उतरते देखे हैं… आँखों में दहशत, और दिलों में टूटती हुई हिम्मत देखी है। दंगों की आहट भर से लोग अपने साये से भी डरते नज़र आते हैं।

लेकिन… अपनी ज़िंदगी में पहली बार मैंने एक ऐसी कौम देखी है जो आसमान से बरसते बमों के नीचे भी खड़ी है…जिसे परमाणु तबाही की खुली धमकियाँ दी जा रही हैं… फिर भी उसके क़दम नहीं डगमगा रहे।

वो खड़े हैं, सीना ठोंक कर, निगाहें झुकाए बिना, लहजे में ज़रा भी कंपन नहीं… और कह रहे हैं: “कर लो जो करना है… हमें मौत से उतना ही इश्क़ है, जितना तुम्हें अपनी ज़िंदगी से।”

करबला के अलमबरदारों के ईमानों की ये वही आख़िरी हद है जहाँ डर मर जाता है और यक़ीन ज़िंदा हो जाता है।
ये वो मिज़ाज है जहाँ जिस्म मिट सकता है… मगर इरादा नहीं।

तारीख़ गवाह है ताक़त सिर्फ हथियारों से नहीं, हिम्मत से बनती है…और जब कोई कौम डर से आज़ाद हो जाए तो उसे हराना सिर्फ मुश्किल नहीं, नामुमकिन हो जाता है।

ऐसे हौसलों को सलाम… ऐसे इरादों को सलाम…
क्योंकि कुछ लोग सच में मरते नहीं वो मिसाल बन जाते हैं।

बाक़ी मैं आने वाली अपनी नस्लों को तुम्हारी तस्वीरें दिखाऊँगा… तुम्हारे वीडियोज़ सुनाऊँगा… और कहूँगा देखो, ये वो लोग थे जो डर के दौर में भी झुके नहीं थे।

जब दुनिया सहम रही थी, ये खड़े थे… जब आसमान आग उगल रहा था, ये मुस्कुरा रहे थे… ये सिर्फ लोग नहीं थे ये हिम्मत की तफ़सीर थे, सब्र की ज़िंदा मिसाल थे।

मैं अपनी औलाद को बताऊँगा कि किताबों में जो बहादुरी पढ़ते हो ना वो सिर्फ अफ़साना नहीं होती, वो ऐसे ही चेहरों में, ऐसे ही लहजों में, ऐसे ही सीना ठोंक कर खडे ड़े इंसानों में ज़िंदा होती है।

वक़्त गुज़र जाएगा… हालात बदल जाएँगे…
मगर तुम्हारा ये हौसला, ये जुर्रत हमारी आने वाली नस्लों के दिलों में हमेशा ज़िंदा रहेगी।

अल्लाह आप सबका हामी और नासिर हो !

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