एक गांव से निकलकर जेद्दा जाज़ान शाहरा पर आए तो दूर से एक अजीब मंज़र दिखाई दिया। जलती धूप में एक बुजुर्ग अकेले, नंगे सहरा रास्ते पर चल रहे थे। उम्र जाहिर तौर पर सत्तर साल या उससे कुछ ज्यादा थी, लेकिन जिस्म में अब भी ताकत बाकी थी। दोस्त ने कहा यह बुजुर्ग इस वीराने में किस हाल में भटक रहे हैं। ड्राइवर ने कहा यकीनन यह कोई यमनी है जो गैर कानूनी रास्ते से आया होगा।
गाड़ी रोकी गई, बुजुर्ग के करीब गए और सलाम किया। पूछा कहां से आए हो। बोले यमन से। फिर सवाल किया कहां जा रहे हो। जवाब मिला मक्का मुक़र्रमा, बैतुल्लाह के दीदार को, उमरा करने।
हमने कहा कानूनी तरीके से आए हो। बोले नहीं, मेरे पास इतने वसाइल कहां। दाखिले के लिए दो हजार रियाल ज़मानत देना जरूरी था और मेरे पास कुल दो सौ रियाल थे। एक सौ सवारी पर खर्च हो गए, एक सौ बाकी हैं। उसके बाद पैदल चल रहा हूं।
दोस्त ने पूछा कितने दिन हो गए चलते हुए। बोले छह दिन से लगातार सफर में हूं।
फिर सवाल किया गया रोज़े से हो। बोले जी हां, साइम हूं।
यह सुनकर हम सब हैरान रह गए। धूप, भूख, प्यास, लंबा सफर और फिर भी रोज़ा। हमने पूछा यह सब चौकियों से कैसे गुजर गए।
बुजुर्ग ने कहा उस रब की कसम जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, मैं हर चौकी के पास से गुजरा लेकिन किसी ने रोका ही नहीं।
उन्होंने आगे बताया कुछ देर पहले तो एक गश्ती पार्टी ने पकड़ भी लिया था और थाने ले गई। मगर जब मैंने कहा कि मेरा मकसद सिर्फ बैतुल्लाह की ज़ियारत है तो उन्होंने रिहा कर दिया।
यह सुनकर हमारे दिल कांप गए। सुब्हान अल्लाह। अल्लाह ने इस बंदे के लिए खुद रास्ते आसान कर दिए। मेरे कफील साहब ने बेइख्तियार दो लिफाफे बुजुर्ग के हाथ में थमा दिए। उन्होंने शुक्रिया अदा किया मगर उन्हें अंदाजा न था कि उसमें कितनी रकम है। मैंने कहा लिफाफे खोलो और पैसे महफूज कर लो। जब उन्होंने लिफाफे खोले और देखा कि दस हजार रियाल हैं तो हैरत और सदमे से गाड़ी में गिर पड़े। आंखों से आंसू बहने लगे और ज़बान पर यही अल्फाज थे यह सब मेरे लिए, यह इतनी बड़ी रकम सब मेरे लिए।
हमने उन्हें होश में लाने के लिए पानी छिड़का। होश आया तो कहने लगे मेरा यमन में एक छोटा सा घर है। उसके साथ एक जमीन थी जिसे मैंने अल्लाह के नाम पर वक्फ कर दिया। उसी पर मैंने अपने बच्चों के साथ मिलकर मस्जिद तामीर की। इमारत मुकम्मल हो चुकी है मगर फर्श और कुछ चीजें बाकी हैं। मैं इसी फिक्र में था कि कहां से रकम आएगी। आज अल्लाह ने आप के जरिए मुझे वह अता कर दी।
यह सुनकर हमारी आंखों से भी आंसू रवां हो गए। उस वक्त दिल में रसूल ए अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फरमान गूंज उठा।
जिसका मकसद आखिरत हो अल्लाह उसके दिल में गिना डाल देता है, उसके कामों को समेट देता है और दुनिया खुद उसके पास झुक कर आती है। और जिसकी फिक्र सिर्फ दुनिया हो अल्लाह उसकी मुहताजी उसकी आंखों के सामने रख देता है, उसके मामलों को बिखेर देता है और उसे दुनिया से वही मिलता है जो उसके मुकद्दर में है।
मेरे कफील ने इशारा किया और मज़ीद दो लिफाफे बुजुर्ग के हवाले कर दिए। यूं कुल रकम बीस हजार रियाल हो गई। बुजुर्ग की आंखों से आंसुओं की झड़ी थम ही नहीं रही थी। वह लगातार दुआएं देते रहे और बार बार दोहराते रहे अल्लाह ने परिंदों की तरह मुझे रिज्क पहुंचा दिया।
वाकई वह लम्हा था जब रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हदीस मुबारक याद आ गई।
अगर तुम अल्लाह पर इस तरह भरोसा करो जैसा कि हक है तो अल्लाह तुम्हें वैसे ही रिज्क देगा जैसे परिंदों को देता है, सुबह खाली पेट निकलते हैं और शाम को भरे पेट लौटते हैं।
यह किस्सा इस बात की जिंदा मिसाल है कि जो बंदा इखलास के साथ अल्लाह के दर को पकड़ ले उसके लिए रास्ते आसान हो जाते हैं। यह वाकया सच्चे दिल से निकली दुआ और तवक्कुल की ताकत का मुंह बोलता सबूत है। अल्लाह तआला हमें भी यह दौलत नसीब फरमाए।

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