ख़ुशी के घर पर ज़बरदस्ती: जब शगुन वसूली बन जाता है



भारत में शादी, बच्चे का जन्म या कोई बड़ा शुभ अवसर जीवन के सबसे आनंददायक क्षण होते हैं। लेकिन आज बहुत-से घरों में इन ख़ुशियों के साथ एक अनकहा डर भी जुड़ा होता है। क्योंकि लोगों को पता होता है— आज दरवाज़े पर “आशीर्वाद” के नाम पर ज़बरदस्ती होगी।
एक समूह आता है। ताली बजती है। कुछ शब्द बोले जाते हैं। और फिर बिना किसी झिझक के रकम घोषित कर दी जाती है—
11,000. 21,000. 31,000. 51,000. 
यह शगुन नहीं है। यह मांग है। और जब मांग के साथ डर, धमकी और अपमान जुड़ा हो, तो उसे एक ही नाम दिया जाता है—
ज़बरन वसूली।

परंपरा का झूठा कवच
इस पूरी प्रक्रिया को अक्सर “परंपरा” कहकर ढक दिया जाता है।
लेकिन सच यह है कि कोई भी परंपरा डर के सहारे नहीं चलती।
इतिहास में हिजड़ा/ट्रांसजेंडर समुदाय की एक सांस्कृतिक भूमिका रही है—यह सच है। लेकिन उस भूमिका की आत्मा थी स्वेच्छा।
आज जब “ना” कहने पर चिल्लाना शुरू हो जाए, अभद्र इशारे किए जाएँ, पूरे कार्यक्रम को बदनाम करने की धमकी दी जाए, तो वहाँ परंपरा समाप्त हो जाती है। वहाँ सिर्फ ज़ोर-ज़बर्दस्ती बचती है।

आज की ज़मीनी सच्चाई: डर का व्यापार
आज कई शहरों में यह एक संगठित मॉडल बन चुका है:
तय दरें, समूह का दबाव, भावनात्मक ब्लैकमेल, सार्वजनिक अपमान की धमकी

लोग पैसे क्यों देते हैं? क्योंकि घर में महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं, बुज़ुर्ग होते हैं, और कोई भी अपनी शादी या नवजात बच्चे के दिन पुलिस बुलाना नहीं चाहता। इसे “स्वीकृति” कहना खुद से झूठ बोलना है। यह डर के आगे झुकना है। और जो डर दिखाकर पैसा लेता है, वह दान नहीं माँग रहा— वह वसूली कर रहा है। 

एक ज़रूरी स्पष्टता
यह लेख यह कहने के लिए नहीं है कि सभी ट्रांसजेंडर लोग ऐसे होते हैं, या उनका सामाजिक उत्पीड़न वास्तविक नहीं है। भेदभाव वास्तविक है। हाशिये पर धकेलना वास्तविक है। लेकिन इस सच्चाई का इस्तेमाल करके गलत व्यवहार को जायज़ ठहराना भी गलत है किसी समुदाय का शोषण हुआ हो, इसका मतलब यह नहीं कि उसे दूसरों को डराने का अधिकार मिल जाए। अगर कोई भी व्यक्ति या समूह—किसी भी पहचान का हो— ख़ुशी के मौके पर आकर ना कहने पर बदतमीज़ी और धमकी देता है, तो वह पीड़ित नहीं, अपराधी है।

क़ानून का सच: कोई अधिकार नहीं बनता
भारत में कोई भी क़ानून यह नहीं कहता कि शादी, बच्चे के जन्म, या किसी भी कार्यक्रम में इस तरह पैसे देना अनिवार्य है। डराना, धमकाना और वसूली करना अपराध है— चाहे करने वाला कोई भी हो। फिर भी लोग चुप रहते हैं क्योंकि: व्यवस्था अस्पष्ट है, पुलिस को बुलाना सामाजिक कलंक माना जाता है, और “आज का दिन खराब न हो” वाली सोच हावी रहती है। यही चुप्पी इस प्रथा को ताक़त देती है।

सबसे बड़ी बेशर्मी
इस पूरी व्यवस्था की सबसे घिनौनी बात यह है कि यह ख़ुशी को बंधक बना लेती है, लोगों की मजबूरी का फायदा उठाती है, और फिर इसे “सम्मान” का नाम दे देती है।
सच यह है सम्मान वह होता है जो अपनी इच्छा से दिया जाए।
जो ज़बरदस्ती लिया जाए, वह सिर्फ पैसा होता है—इज़्ज़त नहीं।

अब बदलाव क्या होना चाहिए
अगर समाज को सच में समाधान चाहिए, तो इस व्यवहार को खुलकर गलत कहना होगा, प्रशासन को शून्य सहनशीलता दिखानी होगी, और ट्रांसजेंडर समावेशन का मतलब सिर्फ रस्मों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, रोज़गार और सम्मानजनक जीवन होना चाहिए। और समाज को यह भी समझना होगा गलत को गलत कहना नफ़रत नहीं है। चुप रहना ही गलत को ताक़त देता है।

अंत में एक सीधा सवाल
अगर किसी घर में ख़ुशी के दिन डर हो, दबाव हो, और पैसे दिए बिना शांति न मिले— तो हमें ईमानदारी से कहना चाहिए यह परंपरा नहीं है। यह शगुन नहीं है। यह सिर्फ और सिर्फ ज़बरदस्ती है। और जब तक हम इसे उसके सही नाम से नहीं बुलाएँगे, यह चलता रहेगा— ख़ुशी को बंधक बनाकर।

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