क्या इंसान आसमानों को पार कर सकता है? क़ुरआन, अक़्ल और विज्ञान की रोशनी में



#अल्लाह_फ़रमाता_है: “ऐ जिन्नों और इंसानों के गिरोह! अगर तुममें ताक़त है कि आसमानों और ज़मीन की हदों से निकल जाओ, तो निकल जाओ। मगर तुम बिना क़ूव्वत और ग़लबे के निकल ही नहीं सकते।” (सूरह अर-रहमान : 33)

इस आयत में अल्लाह तआला ने इंसान और जिन्न दोनों को खुली चुनौती दी है। यह चुनौती महज़ बातों की नहीं, बल्कि हक़ीक़त और हैसियत की है। क़ुरआन साफ़ बता रहा है कि बिना असाधारण ताक़त (क़ूव्वत) और पूर्ण ग़लबे के न तो इंसान और न ही जिन्न आसमानों की हदों को पार कर सकते हैं।

1️⃣ आसमान अनंत है, इंसान सीमित: आसमान कोई एक छत नहीं, बल्कि एक बेहद वसीअ और अनंत कायनात है। इंसान की ज़िंदगी चंद सालों की है 70, 80 या 100 साल। इतनी सीमित उम्र के साथ इंसान उस अनंत सफ़र को पूरा नहीं कर सकता। रास्ता ख़त्म होने से पहले ही इंसान ख़त्म हो जाएगा।

2️⃣ “क़ूव्वत और ग़लबा”: आज का विज्ञान भी यही कहता है: क़ुरआन ने 1400 साल पहले जिस “क़ूव्वत” का ज़िक्र किया, आज विज्ञान उसे थ्रस्ट (बल) कहता है। जब अंतरिक्ष यान (Spacecraft) आसमान की तरफ़ जाता है, तो उसके पीछे ज़बरदस्त बल लगाया जाता है।

जितना ज़्यादा बल, उतनी ऊँचाई बल खत्म सफ़र खत्म यान वहीं तक जा सकता है, जहाँ तक उसकी ताक़त साथ दे। पूरे आसमान या कायनात को पार करना आज के विज्ञान के लिए भी नामुमकिन है।

3️⃣ क़ुरआन का दावा आज भी क़ायम है: आज इंसान चाँद तक पहुँचा, उपग्रह भेजे, मंगल की तस्वीरें लीं लेकिन आसमानों को पार नहीं कर सका। यह बिल्कुल वही है जो क़ुरआन कहता है: “तुम निकल ही नहीं सकते…”

4️⃣ मिराज इंसानी ताक़त नहीं, इलाही क़ुदरत: यहाँ एक अहम बात समझना ज़रूरी है। रसूलुल्लाह ﷺ का मिराज पर जाना इंसानी कोशिश या तकनीक से नहीं हुआ था। न वह आम सफ़र था न इंसानी यान बुराक़ अल्लाह की तरफ़ से दिया गया एक ज़रिया था, और असल ताक़त अल्लाह की क़ुदरत थी, जो हर चीज़ पर क़ादिर है। जो काम इंसान के लिए नामुमकिन है, वह अल्लाह के लिए बिल्कुल आसान है।

#सुब्हानल्लाह! वो ज़ात जो इंसान को उसकी औक़ात भी दिखाती है, और अपनी बेपनाह क़ुदरत भी।
सोर्स: FB
Al-Arqam Da'wah Center Dhanbad

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