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जहांगीर की वफ़ात के बाद शहजादे ख़ुर्रम मुग़ल बादशाह बन गए

#Story हिन्दोस्तान की सरज़मीं पर दुनिया का सातवां अजूबा देने वाले मुग़ल बादशाह शाहजहां की पैदाइश आज के दिन ही, 5 जनवरी 1592 को लाहौर में हुयी थी। वो बादशाह जहांगीर और जोधपुर की राजकुमारी जगत गोसाईं के बेटे थे। 

मुग़ल बादशाह अक़बर ने इनका नाम ख़ुर्रम रखा और शाहजहां की तरबियत के लिये रूकैया सुल्तान बेग़म को मुकर्रर किया और होश सम्भालने तक शाहजहां इन्हीं की तरबियत में रहे। 4 साल की उम्र में उनकी पढ़ाई शुरू हुई मौलाना क़ासिम बेग तबरेज़ी समेत मुख़्तलिफ़ उस्ताद उनकी तालीम के लिए मुक़र्रर किये गए थे लेकिन सबसे क़रीबी हक़ीम अली गिलानी थे।

1607 में नूरजहां ने शाहजहां की शादी अपनी भतीजी अर्जुमंद बनो बेग़म (मुमताज़ महल) से करवा दी और 5 साल बाद 5 अप्रैल 1612 को आगरा में रुख़्सती की रस्म अदा की गयी।

जहांगीर की वफ़ात के बाद शहजादे ख़ुर्रम मुग़ल बादशाह बन गए उन्हें शाहजहां के ख़िताब से नवाज़ा गया। शाहजहां ने अपनी 30 साल की हुक़ूमत में ज़्यादा वक़्त महलों से बाहर जंगों में गुज़ार दिए।
बुराहनपुर में एक जंग के दौरान ही मार्च 1631 को मुमताज़ महल का इंतेक़ाल हो गया जिसके बाद शाहजहां ग़म में रहने लगे दरबार में आना छोड़ दिया लेकिन जब 1632 में ही दक्क्न में क़हत पड़ गया फसलें तबाह हो गयी तब शाहजहां दोबारा दककन गए क़हत पर काबू पाने के लिए जगह-जगह लंगर चलवाए और क़हत पर काबू पाया।

शाहजहां के दौर-ए-हुकूमत को सुनेहरा दौर कहा जाता है हिंदुस्तान में दिल्ली का लाल किला, ताज़महल, जामा मस्ज़िद जैसी कई सारी नायाब इमारतों की तामीर उनके ही दौर में हुयी जो इंजीनियरिंग आर्किटेक्ट का बेहतरीन नमूना है और जो आज भी दुनिया में शानदार इंजीनियरिंग की मिसाल है।
सोर्स: FB

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