शबनम एक संभ्रांत और पढ़े-लिखे सैफी परिवार से ताल्लुक रखती थी। उसने अंग्रेजी और भूगोल में एमए (Post Graduation) किया था और वह प्राथमिक विद्यालय में शिक्षिका थी। दूसरी ओर, सलीम उसी गांव का एक कम पढ़ा-लिखा युवक था जो एक आरा मशीन (Sawmill) पर मजदूरी करता था। दोनों के बीच प्रेम संबंध थे और वे शादी करना चाहते थे, लेकिन शबनम का परिवार इस रिश्ते के सख्त खिलाफ था क्योंकि दोनों के सामाजिक और आर्थिक स्तर में जमीन-आसमान का अंतर था।
पारिवारिक विरोध को हमेशा के लिए खत्म करने और संपत्ति के लालच में शबनम और सलीम ने पूरे परिवार को रास्ते से हटाने की एक बेहद क्रूर योजना बनाई। 14-15 अप्रैल 2008 की दरमियानी रात को शबनम ने अपने पूरे परिवार को खाने में नशीला पदार्थ (दवा) मिलाकर खिला दिया। जब सभी गहरे सन्नाटे और बेहोशी की नींद सो गए, तो शबनम ने सलीम को घर के अंदर बुलाया। इसके बाद दोनों ने मिलकर कुल्हाड़ी से एक-एक कर परिवार के सात सदस्यों की बेरहमी से काटकर हत्या कर दी। मृतकों में शबनम के पिता शौकत अली, मां हाशमी, भाई अनीस और राशिद, भाभी अंजुम, ममेरी बहन राबिया और उसका महज़ 10 महीने का मासूम भतीजा अर्श शामिल था। उस मासूम बच्चे का गला घोंटकर उसे मौत के घाट उतारा गया था।
इस वीभत्स कृत्य को अंजाम देने के बाद शबनम ने खुद को बचाने के लिए रोना-पीटना शुरू कर दिया और ग्रामीणों को बताया कि उसके घर पर लुटेरों ने हमला किया था। वह पुलिस को गुमराह करने की कोशिश कर रही थी और खुद को एकमात्र जीवित बची पीड़ित के रूप में पेश कर रही थी। हालांकि, पुलिस को शुरुआत से ही उसकी थ्योरी पर शक था, क्योंकि घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था और लूटपाट के कोई पुख्ता निशान नहीं थे।
पुलिस ने जब शबनम के फोन कॉल रिकॉर्ड्स खंगाले, तो घटना की रात सलीम से हुई उसकी लंबी बातचीत का खुलासा हुआ। सख्ती से की गई पूछताछ में शबनम और सलीम टूट गए और उन्होंने अपना जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने उनकी निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल की गई कुल्हाड़ी और खून से सने कपड़े भी बरामद कर लिए।
यह मामला अदालत पहुंचा, जहां इस असाधारण क्रूरता को देखकर हर कोई स्तब्ध था। साल 2010 में अमरोहा की सत्र अदालत ने दोनों को दोषी पाते हुए मौत की सजा सुनाई। इसके बाद यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय और फिर देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक गया। साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी मौत की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने इस अपराध को क्रूरता की पराकाष्ठा और 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' (दुर्लभ से दुर्लभतम) माना, क्योंकि एक बेटी ने अपने ही माता-पिता और एक बेकसूर बच्चे की जान ली थी।
इसके बाद राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका भी खारिज कर दी गई। यह मामला कानूनी इतिहास में इसलिए भी बेहद चर्चित है क्योंकि शबनम स्वतंत्र भारत के इतिहास में फांसी के फंदे तक पहुंचने वाली पहली महिला कैदी के रूप में दर्ज हुई। न्याय की इस लंबी प्रक्रिया ने समाज को यह संदेश दिया कि रिश्तों और इंसानियत का कत्ल करने वाले अपराधियों के लिए कानून में कोई ढील नहीं हो सकती।

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