यू एस बनाम जैफरी एप्स्टीन/ ईरान के साथ जंग नहीं


ये दो पोस्टर हैं इस तस्वीर में, जिनको सामने रखकर मैं चंद लाईनें लिखना चाहता हूं।

एप्स्टीन फाइल में नाम तो बहुतों के हैं लेकिन जो एक नाम बहुत बार आया है वो अमरीकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप का है। एप्स्टीन फाइल में किस किस रूप में उसका ज़िक्र ये सब आप लोग बार बार पढ़ चुके हैं। सारी दुनिया पढ़ चुकी है। फिर से लिखना जरूरी भी नहीं और मेरे कलम की आबरू का भी सवाल है।

बदनाम बाजारों रहने वाले, जाने वाले हत्या या बलात्कार के जुर्म में जेल जाने वालों ने भी जब ये दास्तानें सुनी होंगी पढ़ी होंगी तो उन सबका भी सर शर्म से झुक गया होगा। जिन जजों ने उन्हें सजाएं दी होंगीं वो भी सोचते होंगे जिन्हें उन्होंने सजाएं दी हैं उनका जुर्म एप्स्टीन फाइल में दर्ज लोगों के कारनामों के मुकाबले बहुत छोटा है।

यू एस जस्टिस डिपार्टमेंट ने एप्स्टीन फाइल को सारी दुनिया के सामने रखने का फैसला किया है। मेरे चंद सवाल इस वक़्त यू एस जस्टिस डिपार्टमेंट से हैं,,,

 अमरीका के प्रेसिडेंट का नाम जिन गुनाहों के लिए लिखा गया है अगर यू एस जस्टिस डिपार्टमेंट ने उन्हें सही माना तो डोनाल्ड ट्रंप पर मुकदमा क्यों नहीं, उन्हें वही सज़ा क्यों नहीं जो इस जुर्म के मुजरिमों को दी जाती है।

और अगर यू एस जस्टिस डिपार्टमेंट एप्स्टीन फाइल में दर्ज नामों और उनके गुनाहों को सही नहीं मानता, सुबूत नहीं मानता, मुकदमा चलाने और सज़ा देने के लिए काफ़ी नहीं मानता तो यू एस प्रेसिडेंट और इनके जैसे अन्य बड़े लोगों की उनके समाज में, जनता में छवि खराब करने के लिए इस एप्स्टीन फाइल को जारी करना कैसे उचित था।

डोनाल्ड ट्रंप को भी ये अंदाज़ा होगा कि एप्स्टीन फाइल में जिस तरह उनका नाम आया है यू एस जस्टिस कोर्ट उन्हें अदालत में तलब कर सकता है और अगर जुल्म की शिकार या जुर्म के किसी भी चश्मदीद गवाह ने अदालत में आकर गवाही दे दी तो वो सज़ा से बच नहीं सकेंगे।

एक दूसरी बात एप्स्टीन फाइल की 60 लाख फाइलों में से जिस तरह 35 लाख फ़ाइलें जिस तफ्सील के साथ सामने रखी गई हैं उनसे जनता का आक्रोश तो सामने आता ही। देश भर में धरने प्रदर्शन होते। व्यवस्था को संभालना मुश्किल हो जाता।

ऐसा कुछ होता इसके पहले ही अमरीका की तरफ़ से ईरान पर हमला हो गया और एप्स्टीन फाइल पर होने वाली बहस या हंगामा उस रूप में सामने नहीं आया जैसा कि हो सकता था। हालांकि ये बहस अभी भी बंद नहीं हुई है और इस जंग को इतना लंबा नहीं खींचा जा सकता कि एप्स्टीन फाइल या उस में जो कुछ लिखा और दिखाया गया है उसे भुला दिया जाय।

बारहाल इस सिलसिले में अभी बहुत कुछ लिखना है लेकिन इस वक़्त तबीयत साथ नहीं दे रही। शायद कल,,, अब इजाज़त।
साभार: वरिष्ठ पत्रकार अज़ीज़ वर्नी के fb पोस्ट से ली गई हैं।

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