और, जब हुकूमत से लेकर हाकिम-हुक्काम तक, हिंदू-मुस्लिम के नाम पर समाज में दरारें पैदा करने पर आमादा हों ... रमज़ान के इस मुक़द्दस माह में नमाज़ अदा करने या न करने पर फरमान जारी कर रहे हों ... तब तिलक राज जैसे लोगों की बातें की जानी ज़रूरी हो जातीं हैं जो इन नफ़रती फरमानों को ठोकर मारते हुए मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम पेश करने की कोशिश कर रहे हैं ...
वाकया महज़ इतना-सा है कि, इस रमज़ान जब 'अलविदा जुमा' की नमाज़ का वक्त हुआ तो देहरादून के बाज़ार की सड़कें रोज़ेदारों से भरने लगीं ... 'भीड़ नियंत्रण' के नाम पर पुलिस थोड़ी-बहुत ज़्यादती करने लगी ... और जब रोज़ेदारों को नमाज़ अदा करने की जगह नहीं मिली, तब तिलक राज ने ख़रीद-बिक्री बंद कर, अपनी दुकान के दरवाज़े नमाज़ियों के लिए खोल दिए ... उन्होंने कहा-- "इबादत के लिए उनकी दुकान हमेशा खुली है."
तिलक राज के इस पहल की देहरादून में काफी तारीफ़ें हो रहीं हैं ... लोकल यू-ट्यूब चैनल 'True Media House' से बातचीत में वह कहते हैं -- "जो दिखाई नहीं देता उसके पीछे भागते हो ... अरे उसके जो बंदे हैं उसे तो संभाल लो ... रब तो तुम्हारे सामने खड़ा है !"
साभार : FB
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