बहुत से लोग आज भी नहीं जानते, आज बहुत से मुसलमान ऐसे हैं जो नमाज़ पढ़ते हैं, रोज़ा रखते हैं, लेकिन जब बात गरीबों के हक़ की आती है तो या तो लापरवाही कर देते हैं या टाल देते हैं।
इस्लाम ने हमें सिर्फ इबादत ही नहीं सिखाई, बल्कि मख़लूक़ की मदद करना भी सिखाया है। इसी लिए इस्लाम में सदक़ा और फितरा दोनों का हुक्म दिया गया है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि बहुत लोग इन दोनों का फर्क भी नहीं जानते।
1️⃣ सदक़ा क्या है?
सदक़ा वह नेकी है जो इंसान अल्लाह की खुशी के लिए कभी भी दे सकता है। यह सिर्फ पैसे देने का नाम नहीं है। किसी गरीब को खाना खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना, किसी की मदद करना यह सब सदक़ा है।
यहाँ तक कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना भी सदक़ा है। लेकिन याद रखिए, अगर इंसान के पास देने की ताक़त हो और फिर भी वह गरीबों से मुँह मोड़ ले, तो यह दिल की सख्ती की निशानी है।
2️⃣ फितरा क्या है?
फितरा (सदक़ा-ए-फित्र) वह खास सदक़ा है जो रमज़ान के आखिर में ईद-उल-फित्र से पहले देना वाजिब होता है। यह हर उस मुसलमान पर वाजिब है जिसके पास अपनी जरूरत से ज्यादा माल हो। हर आदमी को अपने घर के हर सदस्य की तरफ से फितरा देना होता है, चाहे वह बच्चा हो, बूढ़ा हो या औरत। इसका मकसद यह है कि ईद के दिन कोई गरीब भूखा न रहे। हर गरीब भी ईद की खुशी महसूस कर सके।
*सबसे बड़ी गलती क्या है?*
बहुत लोग ईद की नमाज़ पढ़ लेते हैं, नए कपड़े पहन लेते हैं, दावतें कर लेते हैं, लेकिन फितरा देना भूल जाते हैं या जानबूझकर टाल देते हैं। याद रखिए, अगर फितरा अदा नहीं किया गया तो रोज़ों की कमियों को पूरा करने वाली एक बड़ी नेकी इंसान से छूट जाती है।
*इबरत की बात*
सोचिए, हम हजारों रुपये कपड़ों, मोबाइल और दावतों पर खर्च कर देते हैं। लेकिन जब गरीब को देने की बात आती है तो दिल तंग हो जाता है। याद रखिए, जो माल अल्लाह की राह में दिया जाता है, वही असल में हमारे लिए आख़िरत का खज़ाना बनता है।
अल्लाह हमें सदक़ा देने वाला, गरीबों की मदद करने वाला और फितरा सही तरीके से अदा करने वाला बनाए।
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