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सरकारी पद का दुरुपयोग, रिकॉर्ड में हेराफेरी, जालसाजी और आपराधिक षडयंत्र शामिल

सुप्रीम कोर्ट।  दिल्ली के पूर्व पुलिस आयुक्त नीरज कुमार और पूर्व सहायक पुलिस आयुक्त विनोद पांडे पर 20 साल से भी ज़्यादा पुराने एक मामले में मामला दर्ज किया गया है, जिसमें दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ और आपराधिक धमकी के आरोप शामिल हैं।

यह मामला 2001 की एक घटना से जुड़ा है, जब कुमार सीबीआई में संयुक्त निदेशक और पांडे केंद्रीय एजेंसी में निरीक्षक के रूप में कार्यरत थे। यह मामला उन दावों के इर्द-गिर्द घूमता है कि जाँच के दौरान दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ की गई थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा 10 सितंबर को दिल्ली पुलिस के पूर्व अधिकारियों के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज करने के दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखने के बाद आया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप आरोपियों द्वारा दायर चार अपीलों को खारिज करने के बाद आया, जिनमें दिल्ली उच्च न्यायालय के 2006 के आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें प्राथमिकी दर्ज करने और आपराधिक अवमानना ​​कार्यवाही करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने इसे न्याय का उपहास बताया कि गंभीर आरोपों की दो दशकों से भी अधिक समय तक जाँच नहीं हुई। 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दिल्ली अपराध शाखा ने नीरज कुमार और पांडे के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। इन आरोपों में व्यवसायी विजय कुमार अग्रवाल और उनके सहयोगियों पर की गई सीबीआई जाँच के दौरान कथित तौर पर सबूतों से छेड़छाड़, पद का दुरुपयोग और धमकाने का आरोप शामिल है।

विजय अग्रवाल के एकाउंटेंट शीश राम सैनी का आरोप है कि 1999-2000 में उनके नारायणा कार्यालय पर छापेमारी के दौरान, पांडे और अन्य ने बिना किसी कानूनी दस्तावेज़ के कंपनी के रिकॉर्ड ज़ब्त कर लिए। उनका दावा है कि बाद में अधिकारियों ने ज़ब्ती ज्ञापनों में हेराफेरी की, तारीखें बदल दीं और सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी की, जिससे सैनी को दबाव में आकर फर्जी कागज़ों पर हस्ताक्षर करने पड़े। आईपीसी की धारा 166, 218, 463, 465, 469 और 120बी के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें सरकारी पद का दुरुपयोग, रिकॉर्ड में हेराफेरी, जालसाजी और आपराधिक षडयंत्र शामिल हैं।

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