पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों और जिम्मेदारियों की अनदेखी करके नफरत केंद्रित विचारों को जिस तरह जगह मिल रही है, वह चिंताजनक है



 संवाद और संचार माध्यमों में आधुनिक तकनीकी के बढ़ते प्रयोग के साथ होना यह चाहिए था कि इस क्षेत्र में विषयों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता मजबूत होने के साथ-साथ इसे प्रस्तुत करने वालों के बीच जिम्मेदारी की भावना भी बढ़ती। लेकिन आम जनता और सत्ता के बीच कड़ी के रूप में काम करने वाले समाचार माध्यमों में टेलीविजन चैनलों का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ा है, वैसे-वैसे इस जिम्मेदारी को लेकर कोताही बढ़ी है।

आज हालत यह है कि टीवी चैनलों पर खबरों के प्रस्तुतिकरण और उनके प्रस्तुतकर्ताओं की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। इन दृश्य माध्यमों के मंचों पर पत्रकारिता के बुनियादी मूल्यों और जिम्मेदारियों की अनदेखी करके नफरत केंद्रित विचारों को जिस तरह जगह मिल रही है, वह चिंताजनक है।


गौरतलब है कि नफरत भरे बयान के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टीवी चैनलों के काम करने के तरीकों लेकर गहरी चिंता जताई और कहा कि घृणा भाषण एक खतरा बन गया है, उसे रोकना होगा। अदालत ने कई स्पष्ट टिप्पणियां कीं जो एक तरह से दृश्य माध्यमों के प्रभाव के मद्देनजर उसकी भूमिका को कठघरे में करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि आजकल टीवी चैनल प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं; अगर कोई टीवी समाचार एंकर नफरत फैलाने वाले भाषण के प्रचार की समस्या का हिस्सा बनता है तो उसे क्यों नहीं हटाया जा सकता। अदालत ने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि प्रिंट मीडिया के विपरीत समाचार चैनलों के लिए कोई भारतीय प्रेस परिषद नहीं है।

सवाल है कि आखिर यह स्थिति क्यों आई कि इस मसले पर देश की शीर्ष अदालत को फिक्र जाहिर करने की जरूरत पड़ रही है। अदालत की पीठ ने यह भी कहा कि अगर नफरत फैलाने में जिम्मेदार समाचारों के प्रस्तुतकर्ता या एंकर या उनके प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तब सभी लाइन में आ जाएंगे। इसके अलावा, दिल्ली में आयोजित हुए धर्म संसद में भड़काऊ भाषण के मामले में भी शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ ने दिल्ली पुलिस से सख्त सवाल पूछे कि अब तक जांच कहां पहुंची और कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया।

सौहार्द को बाधित करने वाले नफरती या भड़काऊ भाषणों को लेकर अदालत की चिंता समझी जा सकती है। निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक अहम पहलू है। लेकिन अगर किसी बयान को सनसनी बना कर पेश करने से समाज और देश में सौहार्द के उलट नफरत का माहौल बनता है तो ऐसी अभिव्यक्ति की कीमत क्या होगी!

यह छिपा नहीं है कि पिछले कुछ समय से टीवी चैनलों पर होने वाली बहसें किसी मुद्दे को स्पष्ट करने और हल की राह निकालने के बजाय महज सनसनी फैलाने और संकीर्ण आग्रहों के आधार पर ध्रुवीकरण करने का वाहक बनती गई हैं। विडंबना यह है कि ऐसे कार्यक्रमों के लिए किसी संचालक या संबंधित टीवी चैनल के प्रबंधकों की जिम्मेदारी नहीं तय की जाती।

दूसरी ओर, अखबार या पत्रिका जैसे प्रिंट माध्यमों में समाचार या किसी भी सामग्री की प्रस्तुति पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोकने के लिए बाकायदा भारतीय प्रेस परिषद जैसी संस्था है। दरअसल, प्रिंट माध्यमों में आज भी जिस तरह की जवाबदेही की भावना मौजूद है, वह टीवी चैनलों में कम देखी जाती है। जबकि दृश्य माध्यमों में किसी खबर या बहस की प्रस्तुति के प्रभाव की तीव्रता ज्यादा होती है।

अफसोस की बात है कि समय के साथ शक्तिशाली होते टीवी चैनलों में प्रभाव डालने की क्षमता के समांतर अपेक्षित गंभीरता और संवेदनशीलता की कमी होती गई है। इसलिए इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है, उसे आईना मान कर सुधार पर गौर करने की जरूरत है।

साभार: NARENDER 











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