मुस्लिम समुदाय की इतनी कमजोर राजनीतिक का जिम्मेदार कौन ?



इन घटनाओं में #कॉंग्रेस सरकारों की ढिलाई और कड़े फैसले न लेने के कारण मुस्लिम समुदाय को भारी नुकसान उठाना पड़ा:
👇
हाशिमपुरा और मलियाना (1987): मेरठ (उत्तर प्रदेश) के हाशिमपुरा में पीएसी (PAC) के जवानों द्वारा हिरासत में लिए गए युवकों की हत्या की घटना भारत के इतिहास की एक दुखद त्रासदी है। इस दौरान राज्य और केंद्र दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। आलोचकों का आरोप है कि पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाने और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करने में सरकार पूरी तरह विफल रही।
नेल्ली नरसंहार (1983): असम में चुनाव कराने के फैसले के बीच हुई इस बड़ी हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी। आलोचक इसे प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक लाभ के लिए की गई जल्दबाजी का परिणाम मानते हैं।
भागलपुर दंगे (1989) और अहमदाबाद दंगे (1969): इन बड़े दंगों के दौरान राज्य प्रशासन की निष्क्रियता और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे। आलोचकों का कहना है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकारें अल्पसंख्यक समुदाय की जान-माल की रक्षा करने में नाकाम रहीं।
2. 'सच्चर कमेटी' की रिपोर्ट और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन
2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा गठित सच्चर कमेटी (Sachar Committee) की रिपोर्ट ने देश में मुसलमानों की वास्तविक स्थिति को उजागर किया:
आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति: रिपोर्ट में सामने आया कि दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति अनुसूचित जाति और जनजाति (SC/ST) के समकक्ष या कई मामलों में उनसे भी खराब थी।
सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व: पुलिस, सेना, और नागरिक सेवाओं (Civil Services) में समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद कम पाया गया।
राजनीतिक दावों की पोल: आलोचकों और राजनीतिक विरोधियों ने इस रिपोर्ट का उपयोग यह साबित करने के लिए किया कि कांग्रेस ने मुसलमानों को केवल राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया, लेकिन उनके वास्तविक विकास, शिक्षा और रोजगार के लिए कोई ठोस नीतियां नहीं बनाईं।
3. राजनीतिक तुष्टिकरण बनाम वास्तविक सशक्तीकरण (Symbolism vs Empowerment)
राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों का तर्क है कि कांग्रेस ने समुदाय के लिए "सच्चे सशक्तीकरण" (True Empowerment) के बजाय हमेशा "प्रतीकात्मक राजनीति" (Symbolic Politics) को प्राथमिकता दी:
शाह बानो केस (1985): सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद तत्कालीन राजीव गांधी सरकार द्वारा संसद में कानून बदलकर उस फैसले को पलटने के कदम की तीखी आलोचना हुई थी। आलोचकों का कहना था कि यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और सुधार के खिलाफ था और इसे केवल राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए लिया गया था।
बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना (1986): 1986 में परिसर का ताला खोलने की अनुमति देने के फैसले को भी कई जानकार कांग्रेस की उस रणनीति का हिस्सा मानते हैं, जिससे दोनों पक्षों को साधने की कोशिश की गई, लेकिन अंततः इससे देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा और इसका खामियाजा अल्पसंख्यक समुदाय को भुगतना पड़ा।
👇
आजादी के बाद से कांग्रेस ने मुस्लिम समुदाय को एक सुरक्षित 'वोट बैंक' की तरह देखा, लेकिन जब बात उनके हक, बुनियादी अधिकारों, सुरक्षा, और आर्थिक उन्नति की आई, तो उन्हें केवल वादे और खोखले आश्वासन ही मिले। यही कारण है कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से लेकर ऐतिहासिक दंगों के रिकॉर्ड तक, कांग्रेस की नीतियों पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं।
#साभार 

Post a Comment

0 Comments