सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या शहीदों को वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार थे?

जवाहर बाग: दस साल बाद भी शहादत सवाल पूछ रही है

मथुरा की स्मृति में कुछ घाव ऐसे हैं जो समय के साथ भरते नहीं, बल्कि हर वर्षगांठ पर फिर से हरे हो जाते हैं। जवाहर बाग कांड ऐसा ही एक घाव है।
2 जून 2016 का वह दिन आज भी मथुरा की चेतना में जिंदा है। धुएं, गोलियों, अफरातफरी और रक्तरंजित संघर्ष के बीच उत्तर प्रदेश पुलिस के बहादुर अधिकारियों और जवानों ने कर्तव्य निभाते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उस दिन सिर्फ पुलिस अधिकारी मुकुल द्विवेदी और थाना प्रभारी संतोष कुमार ही शहीद नहीं हुए थे, बल्कि कानून व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी एक कठिन परीक्षा से गुजरा था।

दस साल बीत गए।

दस साल... एक पूरा दशक।

लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या शहीदों को वह सम्मान मिला, जिसके वे हकदार थे? क्या उनके परिजनों को वह न्याय मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी? और क्या राजनीति ने उनकी शहादत को याद रखने से ज्यादा उसे अपने-अपने विमर्श का हिस्सा बनाने में रुचि दिखाई?

जवाहर बाग कांड उस दौर की याद दिलाता है, जब कानून व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। मथुरा आज भी उस भयावह घटना को भूल नहीं सका है। उस समय की सरकार पर प्रशासनिक विफलता के आरोप लगे, विपक्ष ने उसे जंगलराज की संज्ञा दी और जनता ने जवाब मांगे।

फिर सत्ता बदली।

नई सरकार आई। मंचों से जवाहर बाग का जिक्र हुआ। हर चुनावी मौसम में उस घटना को याद किया गया। मथुरा के दौरे पर आने वाले बड़े नेताओं ने उस दौर की आलोचना भी की। लोगों को लगा कि अब शहीदों की स्मृति को स्थायी सम्मान मिलेगा, स्मारक बनेंगे, वादे पूरे होंगे और परिवारों के घावों पर मरहम लगेगा।

लेकिन दस वर्ष बाद यदि शहीद परिवारों को अब भी यह कहना पड़े कि उनकी उम्मीदें अधूरी हैं, तो यह सवाल सिर्फ एक सरकार पर नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था पर खड़ा होता है।

शहीद मुकुल द्विवेदी की पत्नी अर्चना द्विवेदी की पीड़ा केवल एक पत्नी की पीड़ा नहीं है। वह उस हर परिवार की आवाज है, जिसने राष्ट्र और समाज के लिए अपना सर्वस्व खोया और फिर वर्षों तक आश्वासनों की प्रतीक्षा की।

राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि शहादत पर भाषण बहुत होते हैं, लेकिन स्मृतियों को संजोने के काम कम होते हैं।

यदि जवाहर बाग कांड इतना बड़ा था कि वर्षों तक राजनीतिक मंचों से उसका उल्लेख होता रहा, तो फिर यह भी पूछा जाना चाहिए कि शहीदों की स्मृति को स्थायी रूप देने के लिए क्या-क्या किया गया? यदि वादे किए गए थे तो उनकी वर्तमान स्थिति क्या है? यदि योजनाएं बनी थीं तो वे धरातल तक क्यों नहीं पहुंचीं?

यह लेख किसी दल विशेष पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि एक सामूहिक आत्ममंथन के लिए है।

सपा के शासनकाल का वह विवादित अध्याय मथुरा के इतिहास में हमेशा दर्ज रहेगा। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उसके बाद की सरकारें उस त्रासदी से क्या सीख ले सकीं और शहीदों के सम्मान के लिए क्या कर सकीं।

शहादत किसी पार्टी की नहीं होती।

शहादत किसी चुनावी भाषण का विषय नहीं होती।

शहादत राष्ट्र की धरोहर होती है।

जवाहर बाग कांड की दसवीं बरसी पर मथुरा एक बार फिर उन वीर सपूतों को नमन कर रहा है, जिन्होंने कर्तव्य की वेदी पर अपने प्राण अर्पित कर दिए। लेकिन श्रद्धांजलि के साथ-साथ यह सवाल भी गूंज रहा है—

क्या दस साल बाद भी शहीदों के परिवारों को इंतजार ही मिलता रहेगा, या अब सम्मान और स्मृति के अधूरे अध्याय को पूरा करने का समय आ गया है?

क्योंकि इतिहास केवल घटनाओं को नहीं याद रखता, वह यह भी दर्ज करता है कि शहीदों के साथ समाज और सत्ता ने कैसा व्यवहार किया।

Post a Comment

0 Comments