#NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटैंसेस एक्ट, 1985) को हमेशा से देश के सबसे कठोर कानूनों में गिना जाता है। इस कानून की गिरफ्त में जो भी आता है, उसके लिए जमानत पाना आसान नहीं होता और मुकदमा भी लंबा चलता है।
लेकिन अदालतों का एक सिद्धांत हमेशा याद रखना चाहिए —
#कठोर_कानून का पालन भी उतनी ही #कठोर_प्रक्रिया से होना चाहिए।
हाल ही में एक जमानत याचिका पर बहस करते समय फिर वही अनुभव सामने आया, जो अक्सर NDPS मामलों में दिखाई देता है — कई बार जांच करने वाले अधिकारी स्वयं उस प्रक्रिया का पालन नहीं करते, जिसे कानून ने अनिवार्य बनाया है। और यही कारण बनता है कि पूरा प्रॉसीक्यूशन कमजोर पड़ जाता है। तीन मुख्य गलतियां जो पुलिस कर्मियों के द्वारा की जाती है
1. NDPS का कोई भी केस गुप्त सूचना के आधार पर ही चालू होता है. गुप्त सूचना (Secret Information) का सही रिकॉर्ड न होना केस को कमजोर बनाता है .अधिकतर NDPS मामलों की शुरुआत एक गुप्त सूचना से होती है। पुलिस को सूचना मिलती है कि किसी व्यक्ति के पास मादक पदार्थ है।
लेकिन कई मामलों में जब मेमो तैयार किया जाता है तो केवल एक लाइन लिख दी जाती है —
“गुप्त सूचना के आधार पर #मुखबिर खास के साथ छापा डाला गया और माल बरामद हुआ।”
जबकि कानून स्पष्ट कहता है कि यदि कोई #गुप्त_सूचना प्राप्त होती है तो उसे #लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और #वरिष्ठ_अधिकारी को सूचित किया जाएगा।
यह प्रावधान NDPS एक्ट की धारा 42 में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। जब सर्च निजी भवन में होगी तो धारा 42 का अनुपालन आवश्यक है और यदि सर्च सार्वजनिक स्थल पर होगी तो धारा 43 का अनुपालन आवश्यक है इन दोनों धाराओं के प्रोसीजरल फ्ला को आधार बनाकर जमानत याचिकाओं पर बहस केस का रुख बदलने में सफल हो सकती है. अक्सर यह प्रक्रिया पूरी तरह से नहीं निभाई जाती — और यही से केस की नींव कमजोर हो जाती है।
2. इसके बाद पुलिस व्यक्ति की #तलाशी लेती है। कई बार पर्सनल सर्च के साथ-साथ उसके बैग या अन्य सामान की भी तलाशी ली जाती है। लेकिन इस दौरान आरोपी को यह स्पष्ट अधिकार नहीं बताया जाता कि वह मजिस्ट्रेट या गजटेड अधिकारी के सामने तलाशी देना चाहता है या नहीं। यह अधिकार NDPS एक्ट की धारा 50 में दिया गया है।
जब यह प्रक्रिया सही तरीके से नहीं अपनाई जाती, तो अदालत में बहस के दौरान यह एक महत्वपूर्ण बिंदु बन जाता है।
State of Punjab v. Baldev Singh
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि personal search के समय धारा 50 का पालन अनिवार्य है।
इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण निर्णय है:
State of Himachal Pradesh v. Pawan Kumar
इसमें कहा गया कि bag की search personal search नहीं मानी जाएगी, इसलिए केवल bag search में धारा 50 आवश्यक नहीं है।जमानत या ट्रायल की बहस में यह देखना बहुत महत्वपूर्ण होता है कि पुलिस ने वास्तव में personal search की थी या केवल bag search। कई मामलों में यही बिंदु पूरे केस की दिशा बदल देता है।
3. स्वतंत्र गवाह (Independent Witness) का अभाव
तीसरी और बहुत सामान्य गलती यह होती है कि मौके पर कोई स्वतंत्र गवाह नहीं होता।
अक्सर मेमो में यह लिख दिया जाता है —
“मौके पर उपस्थित लोगों से कहा गया लेकिन किसी ने भविष्य के डर से गवाह बनने से मना कर दिया।”
लेकिन उस व्यक्ति का नाम, पता या यह कारण कि उसने क्यों मना किया — यह विवरण दर्ज नहीं किया जाता।
ऐसी स्थिति में अदालत स्वाभाविक रूप से सवाल उठाती है और प्रॉसीक्यूशन की कहानी कमजोर हो जाती है।
निष्कर्ष यह है कि NDPS कानून कठोर है, लेकिन न्यायालय हमेशा यह देखते हैं कि क्या कानून की प्रक्रिया का सही पालन किया गया है या नहीं।
एक अधिवक्ता के रूप में जमानत की बहस करते समय इन प्रक्रियात्मक पहलुओं को समझना और अदालत के सामने रखना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। यद्यपि यह सभी बातें जमानत का आधार नहीं बनती हैं पर जमानत की प्रक्रिया में बहस करते समय जब इन बिंदुओं पर बहस की जाती है तो न्यायालय को जमानत के लिए कनन्विन्स करने का आधार बनता है क्योंकि कई बार न्याय केवल धाराओं से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की सच्चाई से भी तय होता है।
साभार : #advzubersalmani
अधिवक्ता उच्च न्यायालय .

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