याचिका में यह मुद्दा उठाया गया कि कई मामलों में पुलिस द्वारा गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दिए जाते हैं। इससे आम लोगों के मन में पहले से ही एक धारणा बन जाती है, जो बाद में न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। जब ऐसे मामलों में सबूतों की कमी के कारण आरोपी बरी होते हैं, तो लोग न्यायपालिका पर ही सवाल उठाने लगते हैं।
यह स्थिति मीडिया ट्रायल जैसी बन जाती है, जहां फैसला अदालत से पहले ही जनता की राय में हो जाता है। जबकि कानून का मूल सिद्धांत है कि हर व्यक्ति तब तक निर्दोष है, जब तक अदालत उसे दोषी साबित न कर दे।
अदालत की यह चिंता एक जरूरी संदेश देती है कि सूचना साझा करना और न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करना दो अलग बातें हैं। सोशल मीडिया का जिम्मेदार उपयोग ही न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता को सुरक्षित रख सकता है।

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