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दोषी को कानून के अनुसार सख्त से सख्त सज़ा मिलनी ही चाहिए

दिल्ली के उत्तम नगर में होली के दिन हुई एक दुखद घटना में 26 वर्षीय युवक तरुण की जान चली गई। इस घटना से हर संवेदनशील व्यक्ति का दिल दुखी है और मेरी पूरी हमदर्दी तरुण और उसके परिवार के साथ है। किसी भी निर्दोष की जान जाना बेहद दर्दनाक है और दोषी को कानून के अनुसार सख्त से सख्त सज़ा मिलनी ही चाहिए।

लेकिन इसके बाद जिस तरह आरोपी के परिवार के घर पर बुलडोज़र कार्रवाई की खबरें सामने आईं, वह कई गंभीर सवाल भी खड़े करती है। हमारे देश में न्याय देने का अधिकार अदालतों को है, न कि बुलडोज़र को। कानून की किताबों में कहीं भी यह नहीं लिखा कि अगर कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसकी सज़ा उसके पूरे परिवार को दी जाए।

जिस घर को गिराया जाता है, उसमें सिर्फ आरोपी ही नहीं रहते—वहाँ छोटे बच्चे, बुज़ुर्ग माता-पिता, महिलाएँ और कई बार गर्भवती महिलाएँ भी रहती हैं। किसी एक व्यक्ति के अपराध की सज़ा पूरे परिवार को देना क्या न्याय कहलाएगा?

आज के समय में एक आम इंसान अपनी पूरी ज़िंदगी की जमा-पूँजी लगाकर घर बनाता है। उस घर को एक झटके में बुलडोज़र से गिरा देना सिर्फ दीवारें गिराना नहीं, बल्कि कई ज़िंदगियों को बेघर कर देना भी है। अगर हमारे देश में न्याय अदालतों के बजाय बुलडोज़र से होने लगे, तो यह लोकतंत्र और कानून की प्रक्रिया दोनों के लिए चिंता की बात है।

मेरी संवेदनाएँ तरुण की माँ और परिवार के साथ हैं। लेकिन दुख और ग़ुस्से में किसी पूरी कम्युनिटी को निशाना बनाना या नफरत भरी भाषा का इस्तेमाल करना भी सही नहीं है।

एक और सच यह भी है कि होली के दिन अक्सर महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की घटनाएँ सामने आती हैं—चाहे वे मुस्लिम हों या हिंदू। इस समस्या पर भी समाज को गंभीरता से ध्यान देना होगा।

अंत में बस यही कहना है —
जिसने अपराध किया है उसे सख्त से सख्त सज़ा मिले, लेकिन वह सज़ा कानून और अदालत की प्रक्रिया से मिले, न कि किसी को बेघर करके।

न्याय तभी सच्चा होता है जब वह कानून के रास्ते से होकर आए, नफरत के रास्ते से नहीं।
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