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भारत की रूपरेखा को लेकर चर्चा की, उसमें कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लेना आवश्यक नहीं समझा?

 


नीति आयोग। ऐसा लगता है कि विपक्षी दल केंद्र सरकार की हर पहल का बहिष्कार करने पर तुल गए हैं और इस क्रम में यह देखने से भी इन्कार कर रहे हैं कि आखिर इससे उन्हें हासिल क्या हो रहा है? संसद के नए भवन के उद्घाटन का विरोध करने के बाद विपक्ष शासित दस से अधिक राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने नीति आयोग की बैठक का भी बहिष्कार कर दिया। इसके लिए उनकी ओर से जो कारण बताए गए, उन्हें बहानेबाजी के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता।

नीति आयोग की बैठक से दूरी बनाने वाले किसी मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे का सम्मान नहीं कर रही है तो किसी ने यह आड़ ली कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है। यह कुतर्क के अलावा और कुछ नहीं, क्योंकि नीति आयोग की बैठक में उन्हें अपनी बात रखने का ही मौका मिलता।

इस मौके को उन्होंने जानबूझकर गंवाने का काम किया। चूंकि नीति आयोग की बैठक विकास की भावी रूपरेखा को लेकर होती है, इसलिए उसके बहिष्कार का औचित्य समझना कठिन है। नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार कर यही प्रदर्शित किया गया कि आर्थिक विकास से अधिक नारेबाजी की सस्ती राजनीति का सहारा लिया जा रहा है।


क्या इससे दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ हो सकता है कि नीति आयोग की संचालन परिषद की जिस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने विकसित भारत की रूपरेखा को लेकर चर्चा की, उसमें कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लेना आवश्यक नहीं समझा? क्या उन्हें अपने राज्य के साथ देश के विकास पर स्वयं के विचार व्यक्त करने की कोई जरूरत नहीं महसूस हुई? क्या उन्हें यह पता नहीं था कि इस बैठक में स्वास्थ्य, कौशल विकास, महिला सशक्तीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे तमाम विषयों पर विचार-विमर्श किया जाना था या फिर इन मामलों में उन्हें कुछ करने-बताने की आवश्यकता नहीं? विकास के मामले में दलगत राजनीति को प्राथमिकता देना संकीर्णता की पराकाष्ठा तो है ही, अपने लोगों की अनदेखी भी है।


नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करने वाले मुख्यमंत्रियों को यह आभास हो तो अच्छा कि उन्होंने अपने राज्य के हितों की अनदेखी करने का ही काम किया। राज्यों और केंद्र के बीच मतभेद होना समझ आता है, लेकिन उनकी आड़ में नीति आयोग की बैठक से कन्नी काटने का कोई मतलब नहीं बनता। दुर्भाग्य से ऐसा ही किया गया और उसके पक्ष में तरह-तरह के थोथे तर्क देने में भी संकोच नहीं किया गया। कुछ मुख्यमंत्रियों ने तो नीति आयोग की बैठक से दूरी बनाने के लिए उन मुद्दों का उल्लेख कर दिया, जिनका इस आयोग से कोई लेना-देना ही नहीं। उनके इस रवैये से यदि कुछ स्पष्ट हुआ तो यही कि इस बैठक का बहिष्कार करने के बहाने खोजे जा रहे थे। यह अंध विरोध की बेहद ओछी और विकास विरोधी राजनीति है।

साभार: नेहा सांवरिया 





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