ईरान के मौजूदा निज़ाम में उनका ओहदा कितना बड़ा था

ईराक।अली लारिजानी की हत्या के बाद ईरान की तरफ़ से बैकरूम टॉक की रही-सही गुंजाइश भी ख़त्म हो गई. वैसे भी ईरान ने जो शर्तें अमेरिका के सामने रखीं, वे अमेरिका के लिए अपमानजनक थीं. फिर भी, उसमें ऊपर-नीचे होने की गुंजाइश बची हुई थी, लेकिन लारिजानी की हत्या के बाद यह गुंजाइश बहुत कम रह गई है.

बातचीत होगी भी, तो उसमें अब समय लगेगा. अली लारिजानी का नाम मैंने पहली बार परमाणु वार्ता के दौरान सुना था. इस युद्ध के दौरान लारिजानी को जिस तरह की ज़िम्मेदारी दी गई, उससे पता चलता है कि ईरान के मौजूदा निज़ाम में उनका ओहदा कितना बड़ा था. 

उनमें सैन्य के साथ-साथ कूटनीतिक समझ भी थी. वह काफ़ी दिलेर थे. जब अमेरिका बार-बार यह कह रहा था कि ईरान के नेता ‘चूहों’ की तरह बिल में छिप गए हैं, तब लारिजानी पब्लिक रैली में घूमते नज़र आए थे. पिछले हफ़्ते की बात है.

उस तस्वीर ने अमेरिका-इज़रायल की त्योरियां चढ़ा दी थी. लारिजानी की हत्या को कुछ लोग इज़रायल-अमेरिका की ताक़त के तौर पर पेश कर रहे हैं कि उसने कहकर हत्या कर दी. उन्हें ईरान और इज़रायली शैलियों के बीच का फ़र्क़ नहीं पता.

ईरान के नेता बंकरों में नहीं रह रहे हैं. खामनेई को भी पता था कि वह निशाने पर हैं, लेकिन वह छिपे नहीं. लारिजानी तो युद्ध के बीचोबीच घूम रहे थे. अभी, जिस समय हत्या हुई तब भी वे अपनी बेटी से मिलने गए थे. सांस्कृतिक फ़र्क़ है. 

ईरान में शहादत की संस्कृति रही है. इसलिए, आप पाएंगे कि ईरान में मरने की ख़बरों को दबाया नहीं जाता, बल्कि इसकी पुष्टि की जाती है और कई बार ख़ुद आगे बढ़कर आंकड़े जारी किए जाते हैं. वहीं, अमेरिका पर यह इल्ज़ाम लग रहा है कि वह मरने वाले सैनिकों की संख्या कम करके बता रहा है. इज़रायल तो ख़ैर कुछ बता ही नहीं रहा है. 

अमेरिका-इज़रायल की तरफ़ से युद्ध ‘जीतने’ का पॉइंट ढूंढने के लिए जो भी कोशिशें हो रही हैं, वे सब युद्ध के हालात को और बदतर बना रही हैं. लारिजानी की हत्या के बाद ईरान में ‘बदला’ का वही टोन सुनाई दे रहा है, जो खामनेई की हत्या के समय सुनाई दे रहा था.
साभार:FB 

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