इस युद्ध ने इस बात को स्थापित कर दिया है कि अब लड़ाई के तरीक़े बदल गए हैं. आगे और भी बदलने वाले हैं.
2-3 सौ साल पहले दुनिया पर नौसेना का राज चलता था. यूरोपियन सेना समंदर में उतरती थी और दुनिया के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक अपना उपनिवेश बनाती फिरती थी.
पहले विश्वयुद्ध में टैंक और थल सेना का रौला था.
दूसरे विश्वयुद्ध आते-आते लड़ाकू जहाज़ निर्णायक स्थिति में पहुंच गया. जहाज़ वाला सिलसिला तबसे लेकर अब तक चलता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसमें तेज़ी से बदलाव हुए हैं. लड़ाकू विमान से डॉगफ़ाइट और बम बरसाने वाली तकनीक पुरानी हो गई है.
इसी वजह से कमज़ोर वायुसेना के बावजूद ईरान ने अमेरिका और इज़रायल की हालत पस्त कर दी है. अभेद्य माने जाने वाले F-35 पर हुए हमले पर पूरी दुनिया की नज़र है. यह एक लाइन वाली ख़बर नहीं है कि F-35 को ईरान ने डैमेज कर दिया. इसने अमेरिका को हिला दिया है.
ईरान ने वायुसेना की कमज़ोरी को मिसाइल और ड्रोन की ताक़त से ढंक दिया. एक जहाज़ बनाने में हज़ारों करोड़ लगते हैं, ईरान ने कुछेक लाख और कुछेक करोड़ रुपये में तैयार होने वाले शाहिद ड्रोन का जख़ीरा बना लिया है.
उसके पास बैलिस्टिक, क्रूज़, ऐंटी-शिप, हाइपरसोनिक समेत तरह-तरह की दर्जनों मिसाइलें हैं, जो अरबों के जेट ख़रीदने से ज़्यादा कारगर साबित हो रही हैं.
मोपेड जैसे इंजन से चलने वाले ड्रोन को मारने में अमेरिका के पैट्रियट और थाड जैसे सिस्टम पस्त हो गए.
अमेरिका-इज़रायल की डिफ़ेंस क्षमता पहले दस दिनों में ही सैचुरेशन लेवल पर पहुंच गई और पिछले एक हफ़्ते से पूरी तरह पस्त हो गई है.
इज़रायल के डिफ़ेंस सिस्टम को ही दुनिया में हर जगह गिनाया जाता था. वह ख़ुद इसके लिए गाल बजाता रहता था, अब उसका वही क़िला ध्वस्त हो गया.
वहीं, ईरान को इस युद्ध से पता चला है कि उसे अपनी डिफ़ेंस क्षमता मज़बूत करनी होगी.
अटैक तो है, लेकिन डिफ़ेंस नहीं है. आयरन डोम, डेविड स्लिंग और एरो-2, 3 के मुक़ाबले ईरान के पास मोटे तौर पर रूसी S-300 (और शायद 400 भी) और स्वदेशी बावर-373 है.
चीन जैसे देश इस मामले में बहुत आगे पहुंच गए हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर में सबसे अव्वल है. उसके पास सैटेलाइट से लेकर रडार को चकमा देने, सिग्नल ब्लॉक करने, सिग्नल की नक़ल करने के साथ-साथ दुनिया भर में हो रहे युद्ध का रीयल-टाइम डेटा है. मैन्युफ़ैक्चरिंग में तो ख़ैर पूरा यूरोप और अमेरिका मिलकर भी उसके सामने नहीं टिक पाएंगे.
धीरे-धीरे सब चीन के क़दम पर ही चलेंगे. अमेरिका अब यूक्रेन से सस्ते इंटरसैप्टर मांग रहा है. उसे समझ में आ गया कि ज़रूरी नहीं कि इंटरसैप्टर मिसाइल महंगी होगी, तो कारगर होगी ही. अमेरिकी GPS का रौला भी ख़त्म हो गया.
साभार : FB

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