हिटलर के ज़िंदा रहते हुए अमेरिका के इन्हीं स्टूडियो ने तमाम फ़िल्में बनाईं

अमेरिका में इज़रायली और यहूदी लॉबी बहुत महीन, सघन और कारगर तरीक़े से काम करती है. समूचा हॉलीवुड, यहूदियों का बनाया हुआ है. पैरामाउंट पिक्चर्स, वॉर्नर्स ब्रदर्स, MGM, 20th सेंचुरी फ़ॉक्स, यूनिवर्सल पिक्चर्स इन सबकी स्थापना यहूदियों ने की. अमेरिका समेत पूरी दुनिया पर अब भी इन स्टूडियो का दबदबा है. 

OTT में सबसे बड़े नाम नेटफ़्लिक्स का को-फ़ाउंडर और पहला CEO मार्क रैंडॉल्फ़ यहूदी हैं. अमेज़ॉन के मौजूदा CEO ऐंडी जेसी यहूदी हैं. डिज़्नी में 1984 से 2026 तक के सभी CEO यहूदी रहे हैं. 

न्यूज़ मीडिया का भी यही हाल है. जो यहूदी नहीं हैं, वे रूपर्ट मर्डोक जैसे धुर इज़रायल समर्थक हैं. मर्डोक वहां पर फ़ॉक्स न्यूज़, वॉल स्ट्रीट जर्नल, न्यूयॉर्क पोस्ट, वग़ैरह के मालिक हैं. बाक़ी, सीधे यहूदी की ओनरशिप वाले दर्जन भर मीडिया ग्रुप हैं. बड़े से लेकर मझोले और छोटे स्तर तक.

यहूदियों ने हिटलर वाली जर्मनी में अंतहीन यातनाएं झेली हैं, लेकिन आप पाएंगे कि उन यातनाओं को फ़िल्मों में, सीरीज़ में, मीडिया में व्यापक जगह मिली. हिटलर पर दर्जनों फ़िल्में, डॉक्यूमेंट्री, और सीरीज़ बनी हैं. इनमें से कई तो क्लासिक हैं.

यहूदियों के दर्द से पूरी दुनिया वाकिफ़ हैं. गंभीर किताबों से लेकर गंभीर फ़िल्मों तक, पॉपुलर रिपोर्ट से लेकर पॉपुलर फ़िल्मों तक की पूरी रेंज है. कौन होगा जिसे नहीं पता होगा कि यहूदी सताई हुई क़ौम है!

इन स्टूडियो के मालिकों, अधिकारियों ने ख़ुद पर ज़ुल्म ढाने वालों को दुनिया के सामने ज़लील करके रख दिया. 

लेकिन क्या आपने कभी देखा है कि इन स्टूडियो या OTT प्लैटफ़ॉर्म ने लीबिया, सीरिया, इराक़, लेबनान, यमन या फ़िलिस्तीन के सताए हुए लोगों पर कोई फ़िल्म बनाई है? क्या कभी देखा है कि फ़िलिस्तीन के क़त्लेआम को फ़िल्मों में दिखाया गया हो? वहां की ‘नस्लीय सफ़ाई’ को फ़िल्मों में जगह मिली हो?

नहीं, क्योंकि इसमें इज़रायल विलेन है. अमेरिका विलेन हैं. यहूदी विलेन है. अलबत्ता हाल की फ़िल्मों और सीरीज़ में मोसाद को मानवीय तरीक़े से पेश करने की कोशिश की गई है. Fauda जैसी सीरीज़ में IDF (इज़रायली डिफ़ेंस फ़ोर्स) और मोसाद को ग्लोरिफ़ाई किया गया है. 

क्या आपने कोई अमेरिकी फ़िल्म या सीरीज़ देखी है जिसमें दुष्ट हिटलर को ग्लोरिफ़ाई किया गया हो? 

इज़रायली ‘हसबारा’ के ज़रिए दुनिया भर के फ़िल्म निर्माताओं को यह सुविधा दी जाती है कि वह इज़रायल में भारी टैक्स डिसकाउंट के साथ शूटिंग करें और इज़रायली नैरेटिव को दुनिया के सामने रखें. सात-आठ साल से हिंदी फ़िल्म उद्योग के साथ भी इज़रायल का यह सिलसिला शुरू हुआ है. 

दर्जनों हीरो-हीरोइन-निर्देशक इज़रायल जा चुके हैं. हर साल इज़रायल के साथ किसी न किसी के को-प्रोडक्शन का क़रार हो रहा है. मरहूम सुशांत सिंह राजपूत की फ़िल्म ड्राइव की ज़्यादातर शूटिंग तेल अवीव में हुई थी. वह संभवत: पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसका बड़ा हिस्सा इज़रायल में शूट हुआ. 

2018 में नेतन्याहू ने अमिताभ बच्चन समेत बॉलीवुड के कई कलाकारों से मुलाक़ात की. 

ये सब बहुत सोच-समझकर किया जा रहा है. एक rogue state को मानवीय बनाने दिखाने के लिए. 

इससे पहले कि कोई यह सवाल करे कि जर्मनी में यहूदियों का सताया जाना इतिहास का मामला है और उस पर व्यापक सहमति बनी हुई है, इसलिए उस विषय पर फ़िल्म बनाने में कॉन्फ़्लिक्ट पैदा नहीं होता, लेकिन समसामयिक विषयों पर किसी देश को विलेन दिखाना चुनौती भरा काम है, उनके लिए दो बातें. 

पहली, हिटलर के ज़िंदा रहते हुए अमेरिका के इन्हीं स्टूडियो ने तमाम फ़िल्में बनाईं. 

यह साहसिक काम चार्ली चैपलिन जैसे ग़ैर-यहूदियों ने भी किया. उनकी द ग्रेट डिक्टेटर को कौन भूल सकता है! 

दूसरी, समसामयिक मुद्दों पर फ़िल्में तो बन ही रही हैं, लेकिन इनमें पश्चिम एशिया के हर मुल्क को आतंकवादियों के अड्डे के तौर पर दिखाया जाता है, सिवाय इज़रायल के. फ़िल्मों में अगर सीरिया, इराक़, लेबनान, अफ़ग़ानिस्तान, फ़िलिस्तीन या किसी भी दूसरे मुल्क का ज़िक्र आ जाए, तो पहले समझ में आ जाता है कि यहां विलेन होगा.

राजनीति की बात इसमें नहीं की गई है, लेकिन अमेरिकी राजनीति को भी इज़रायली लॉबी कंट्रोल करती है.
साभार: FB 
दिलीप खान 

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